शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

Eltyshevi - 07

अध्याय 7


बसंत ऋतु धीरे-धीरे, मुश्किल से आ रही थी. कभी ऐसा लगता, जैसे वह अपने पाँव जमा रही है, धरती पर ज़िन्दा धागे छोड़ रही है, कभी निराश होकर ग़ायब हो जाती है, बर्फ की नई लहर में दफ़न हो जाती है.
शहर में तो बसंत का सर्दियों से युद्ध क़रीब-क़रीब महसूस ही नहीं हुआ, सिर्फ कुछ महत्वपूर्ण पल ही देखे गए – जैसे, छत से पानी चू रहा है, बर्फ पिघल रही है, घास रेंगने लगी है, कलियाँ फूटने लगी हैं, और पेड़ जैसे हरी-हरी धूल से ढँक गए हों. मगर गाँव में उसे पल-पल महसूस किया जा रहा था, उससे जुड़ी हर छोटी से छोटी सी बात भी बहुत महत्वपूर्ण थी. वलेंतीना विक्तोरोव्ना इस बसंत ऋतु का इंतज़ार इतनी बेसब्री से कर रही थी, जितना उसने पहले कभी, बचपन में भी, नहीं किया था.
यहाँ आकर छह महीने हो चुके थे मगर उसकी एक भी दोस्त नहीं बनी थी. पति के भी कोई दोस्त नहीं थे. यूर्का अक्सर आ जाता था, देहलीज़ के पास बैठ जाता, सिगरेट पीता, बताता कि यहाँ की गर्मियाँ कैसी शानदार होती हैं, तत्परता से निकोलाय के निर्माण-कार्य की योजनाओं से जुड़ जाता – “हम ऐसे   ऐसे महल बनाएंगे! मैं तुम्हारी मदद करूँगा, मिखालिच, तू क्यों फ़िकर करता है! च—ल...” और जाने से पहले “तीस का नोट” उधार मांगता. कभी निकोलाय दे देता, और तब यूर्का का चेहरा खिल उठता, वहीं बैठ कर बोतल खोलने की पेशकश करता, मगर जब पैसे नहीं मिलते तो मुँह फुला लेता, जैसे किसी ने तय कार्यक्रम के लिए मानधन न देकर उसके साथ धोखा किया हो.
यूर्का के तेरह से चार साल तक के छह बच्चे थे – चार लड़के और दो लड़कियाँ. फ़र्म बन्द होने के बाद वह ख़ुद कहीं भी काम नहीं करता था, बीबी दुकान में फ़र्श धोती थी. “कैसे जीते हैं?” वलेंतीना विक्तोरोव्ना को अक्सर ये सवाल सताता था, और वह हिसाब लगाने लगती: बीबी को हद से हद डेढ़ हज़ार रूबल्स मिलते होंगे, ऊपर से बच्चों के दी जाने वाली धनराशि (सत्तर रूबल्स प्रतिमाह), हो सकता है कि रिश्तेदार कुछ मदद करते होंगे, हो सकता है कि, मुश्किल से, यूर्का भी कुछ इंतज़ाम करता होगा, जिस पर कम ही विश्वास होता है. शरद ऋतु में ग्राहकों को कितने का आलू बेचते होंगे. चलो, मान लो अगर तीन हज़ार का भी बेचा (तीन कहाँ से होंगे – कम ही होंगे), इस फ़ौज को खिलाना, उनके कपड़ों का इंतज़ाम... कैसे करते होंगे?
यूर्का के बच्चों को कई बार देखा था. बड़ी तेरह साल की लीदा, अपनी उमर के हिसाब से ठीक-ठाक बढ़ रही थी, शरीर एकदम सही अनुपात में था, मगर दूसरा, ग्यारह साल का पाव्लिक, ऊँचाई में, कद-काठी में आठ-नौ साल के बच्चे जैसा था; बाकी के बच्चे भी कम ऊँचाई के, दुबले-पतले, भावहीन चेहरे... “इनका क्या होगा?”
वलेंतीना विक्तोरोव्ना उन लोगों से क़रीब-क़रीब मिलती ही नहीं थी, जिन्हें वह शिक्षा के लिए प्रिपेरेटरी इन्स्टीट्यूट जाने से पहले जानती थी. बात भी सही है – क़रीब चालीस साल बीत चुके हैं. मगर फिर भी मन नहीं करता था: ऐसा लगता कि वे सब किसी भयानक प्लेग या हैजे से मर गए हैं, और वे जो ज़िन्दा बचे हैं, ऐसे लगते थे जैसे बीमार चल रहे हों या अभी-अभी बीमारी से उठे हों – मरियल, निर्जीवता की हद तक उदासीन. वलेंतीना विक्तोरोव्ना अपनी मुसीबतों के बारे में बताना और ये कहना शुरू करती ही थी कि बुढ़ापे में सब कुछ फिर नए सिरे से शुरू करना होगा, मगर वे यंत्रवत् सिर हिलाते, उनींदेपन से आह भरते और उसकी आँखों से परे, कहीं दूर, अनंत में देखते. सड़क पर अपनी धीमी हलचल को जारी रखते हुए, बिदा भी वैसे ही होते, जैसे मिलते थे.
सिर्फ एलेना खारिना से ही वलेंतीना विक्तोरोव्ना की थोड़ी बहुत पटती थी – ये वो औरत थी जो सर्दियों के मध्य में उनके घर आई थी, जिसने मदद की पेशकश की थी, हालाँकि उसके परिवार को भी ज़रूरत थी – वे उनके सामान वाले कन्टेनर का इंतज़ार कर रहे थे, मगर वो पहुँच ही नहीं रहा था. वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने पति से सलाह-मशविरा करके खारिनों से पहले ही, बिना देखे, पेट्रोल से चलने वाली चेन-आरी ख़रीद ली. ढाई हज़ार रूबल्स में (इतना पैसा घर में निकल आया) – मार्केट-रेट से क़रीब डेढ हज़ार रूबल्स कम में.
”बस-बस लाते ही होंगे,” पैसों को जेब में रखते हुए एलेना ने यक़ीन दिलाया. “बस-बस... वहाँ ट्रांसपोर्ट की प्रॉब्लम आ गई थी, मगर अब, ख़बर मिल गई है कि वे चल पड़े हैं. और आरी ख़ूबसूरत है – ‘तायगा’ !
कार को भी ठीक करवाना पड़ा, हालाँकि इसमें पैसे लगे. अप्रैल के आरंभ में उसे यहाँ लाया गया. फ़िलहाल गैरेज को बेचने के बारे में कोई फ़ैसला नहीं किया – चाहे जैसा भी हो, मगर शहर में स्थित किसी अचल सम्पत्ति को खोने का डर था. अंतिम फ़ैसले की घड़ी टालते रहे.                                        
निकोलाय घर बनाने के लिए ज़मीन का टुकड़ा ढूँढ़ने लगा. मगर, ये इतना आसान नहीं था – हालाँकि तान्या आण्टी की सम्पत्ति सत्रह एकड़ में फैली थी, आँगन छोटा सा ही था, उसमें चारों ओर निर्मित ढाँचे थे: खलिहान और कोयले की कोठरी, स्नानगृह, जानवरों को रखने की जगह, गर्मियों वाला किचन. इनके पीछे - शौचालय, एक सर्विस-रूम, जहाँ गर्मियों में मुर्गियाँ रहती थीं. ये सारे ढाँचे एक दूसरे के बहुत पास-पास थे. इसकी वजह, बेशक, ये थी कि सर्दियों में, बर्फ में, कॉटेज से भागकर एक सेकण्ड में स्नानगृह या कोयले की कोठरी तक पहुँचा जा सके. तो फिर उसमें घर और गैरेज को कैसे घुसेड़ा जाए? ऊपर से “मस्क्विच” भी आ गई थी, उसने लगभग पूरा आँगन ही घेर लिया था.
निकोलाय ने आण्टी के सामने ही कहा कि, लगता है, खलिहान और मवेशियों का बाड़ा तोड़ना पड़ेगा, उसकी राय पूछी. आण्टी ने अपना पतला हाथ उठाकर नीचे गिरा दिया:
 “ठीक है, तोड़ो, तोड़ो. मुझे अब करना ही क्या है...बस किसी तरह ज़िन्दा रहना है...मुर्गियों के बारे में अफ़सोस होता है – सर्दियों में खुले आसमान के नीचे वे कैसे रहेंगी...”
“नया दड़बा बना लेंगे,” मुस्कुराहट से, मगर काफ़ी दुख से निकोलाय ने कहा.
आण्टी ने निराशा से आह भरी.
वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने महसूस किया कि इसके बाद पति के मन में किसी चीज़ में परिवर्तन की ललक ही जाती रही. वह काफ़ी देर तक आँगन में लकड़ी के सड़े हुए ठूँठ पर बैठा रहता, अक्सर सिगरेट पीता रहता. लगातार एक के बाद दूसरी. नाक-भौंह चढ़ाए काली, टेढ़ी कॉटेज की ओर देखता रहता, उसी तरह के लोभान की गंध छोड़ते अन्य ढाँचों की ओर देखता रहता. उसकी आँखों में लिखा था: “क्या करूँ? मैं यहाँ का मालिक नहीं हूँ. मैं अपनी मनमानी कैसे कर सकता हूँ?”
एक बार यूर्का एक आदमी को अपने साथ लाया. ये आदमी ज़्यादा ऊँचा नहीं था, बढ़िया कपड़े पहने, चमड़े की कैप लगाए, बगल में फाईल दबाए था. जैसे ही वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने खिड़की से उन्हें गेट की ओर आते देखा, वह घबरा गई – दिल में दर्द होने लगा, शायद डेनिस के बारे में कोई भयानक ख़बर लाए हैं. या तो वो भाग गया है, या फिर इससे भी ज़्यादा बुरी...आंगन में भागना ही चाहती थी, मगर तभी उसने अपने आप को रोक लिया, बाल ठीक किए, स्वेटर डाला, धीरे से चल पड़ी. फिर रुकी, उनके अन्दर आने तक इंतज़ार करने का फ़ैसला किया.
वह आदमी अन्दर आ ही नहीं रहा था, उसने दरवाज़े को धकेलकर बाहर देखा... पति ध्यान से बढ़िया कपड़ों वाले की बात सुन रहा था, जो धीमी आवाज़ में, मगर जोश में कुछ कह रहा था. बगल में ही यूर्का की चुलबुलाहट जारी थी, जो कभी निकोलाय की आँखों में देखता, कभी उस आदमी की जिसे अपने साथ लाया था.
“क्या बात है?” शांत रहने की कोशिश करते हुए वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने पूछा.
 “वो...” निकोलाय ने बदहवासी में होंठ टेढ़े किए. “हमारे लिए प्रस्ताव लाए हैं...”
 “नमस्ते!” वलेंतीना विक्तोरोव्ना की ओर देखकर वह आदमी बेहद ख़ुश हो गया, उसने अभिवादन किया और फ़ौरन निकोलाय की ओर मुड़ा: “स्थानीय लोगों के लिए ये बेहतर है – स्प्रिट बढ़िया क्वालिटी की है, पीने लायक...
“बात क्या है?” वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने उसकी बात काटते हुए पूछा. वह फिर से उत्तेजित हो गई, मगर अब किसी और वजह से. “घर के अन्दर चलें?”
वह आदमी राज़ी हो गया:
 “हाँ, ज़रूर.”
 “नहीं, कोई ज़रूरत नहीं है,” यूर्का ने रोका, “ वहाँ, वो, दादी है. फिर से भुनभुनाने लगेगी.”
 “हुम्... तो मैं ये कह रहा था...” अब वह आदमी वलेंतीना विक्तोरोव्ना से ज़्यादा मुख़ातिब हो रहा था. “यहाँ, ज़ाखोल्मोवो में, जैसा कि आप, शायद, जानती हों – स्प्रिट बनाने का कारखाना है. स्प्रिट-कारखाना. स्प्रिट पीने लायक है, वोद्का के लिए उपयुक्त है...”
 “हाँ, हमने पीकर देखा है,” निकोलाय ने फिर से होंठ टेढ़े किए, “अभी तक जले हुए रबड का स्वाद मुँह में है.”
“क्या?” एक पल के लिए वह आदमी तैश खा गया. “आ-आ, तो वो,” उसने मुस्कुराते हुए होंठ फैला लिए, “वो आपने चोरी की पी ली थी. कुछ लोग थे ऐसे, जो चुराई हुई स्प्रिट बेचते थे. हमने उनका इंतज़ाम कर दिया है.”
 “ऊहूँ,” यूर्का ने अप्रसन्नता से पुष्टि की.
   “ अब हम इस इलाके में अपना नेटवर्क बना रहे हैं. सब कुछ शरीफ़ाना ढंग से होना चाहिए...बारह डिग्री से ऊपर के अल्कोहोल की बिक्री का लाईसेन्स दुकान को फिर से नहीं मिला, मतलब, लोग वह ज़हर ही पीते रहेंगे. जैसे क़ैदी -  ज़ेलेन्का पीते हैं...”
 “तो आप क्या चाहते हैं?” वही बात बार-बार सुनकर वलेंतीना विक्तोरोव्ना थक गई, उसने हँसते हुए पति की ओर सवालिया नज़रों से देखा.
 “ स्प्रिट का बिज़नेस करने का सुझाव देते हैं,” उसने कहा.
 “प्रैक्टिकली - हाँ,” अच्छे कपड़े पहने हुए आदमी ने पुष्टि की और यक़ीन दिलाने वाले अंदाज़ में जल्दी-जल्दी बताने लगा; ऐसा फ़ैशनेबल मॉल्स में ख़ास तौर से मौजूद लोग बताते हैं. – “हर चीज़ केन्द्रीकृत है, ‘ऊपर’ से इजाज़त मिली है. आवश्यकता के अनुसार मैं तीस-तीस लिटर्स पीने योग्य स्प्रिट लाता रहूँगा, कन्टेनर में. आप उसको लोगों में बाँटते जाईये... मैं स्प्रिटोमीटर दूँगा. पम्प से बहुत ऊँची किस्म का पानी मिलता है, उसे उबालने की भी ज़रूरत नहीं है. आधे लिटर की कीमत होगी – तीस रूबल्स, आप अपने हिसाब से इसे बढ़ा भी सकते हैं – दस, पन्द्रह रूबल्स. हमारा अनुभव बताता है कि पैंतलीस रूबल्स तक की कीमत लोगों को ठीक लगती है. ले लेते हैं...”
वलेंतीना विक्तोरोव्ना को उस आदमी के प्रस्ताव से धक्का नहीं लगा – आजकल सभी हर संभव तरीक़े से पैसा कमाते हैं, - बल्कि उसे इस बात से आघात पहुँचा कि निकोलाय क्यों उसकी बात काट नहीं रहा है, उसे आँगन से भगा नहीं रहा है. उल्टे, मुस्कुराना छोड़कर ध्यान से उसकी बात सुन रहा है, दिमाग़ में कोई हिसाब लगा रहा है...उसे ख़ुद ही बीच में कूदना पड़ा:
 “सु...सुनिये! आप शायद नहीं जानते कि किसके पास आए हैं. कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे हैं कि ऐसी छोटी सी, दयनीय झोंपड़ी में रहते हैं, तो उनके पास जाकर ऐसी बात कह सकते हैं, मना नहीं करेंगे? मेरे पति ने तीस साल तक पुलिस की नौकरी की है. अब रिटायर हो चुका है...मैं – लाईब्रेरियन थी...आपको शरम नहीं आती! कोल्या, इसे बाहर छोड़ आओ!”
 “ “रुकिए-रुकिए,” समझौते के सुर में उस आदमी ने हाथ उठा दिए, “ मैं आपको कोई आपराधिक काम करने के लिए तो नहीं कह रहा हूँ. बल्कि बात बिल्कुल उल्टी है. प्लीज़, समझने की कोशिश कीजिए, लोग हर तरह का ज़हर पीकर मर रहे हैं. मगर यहाँ – पीने योग्य स्प्रिट, कारखाने में बना हुआ. कह सकते हैं कि ये तो फ़ायदेमन्द काम है...”
 “ठीक है, माननीय महोदय, वाक़ई में,” आख़िर में निकोलाय की आवाज़ फूटी. “हम किसी तरह, जैसे पहले...अलबिदा?”
उस आदमी ने कंधे उचका दिए:
 “अफ़सोस की बात है. मैं ख़ास तौर से आपके पास इसलिए आया था कि आपके बारे में लोगों की अच्छी राय है. मुझे आपसे समझदारी की उम्मीद थी. तो फिर क्या, अलबिदा.” और वह गेट की तरफ़ बढ़ा.
यूर्का गहरी साँस लेकर उसके पीछे हो लिया. उसे पकड़ कर उसके कान में इतनी ज़ोर से फुसफुसाया कि वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने सुन लिया:
 “मैं और किसी को दिखाऊँगा. वो लोग बिल्कुल तैयार हो जाएँगे.”
 “क्या दूर है?”
 “नहीं, सड़क के उस ओर...”
उनके जाने के काफ़ी देर बाद तक भी एल्तिशेवों की नाराज़गी कम नहीं हुई – वलेंतीना विक्तोरोव्ना बेहद नाराज़ थी, निकोलाय मिखाइलोविच कुछ संयमित था. मगर इस नाराज़गी में अफ़सोस का पुट भी था – अफ़सोस इस बात का कि वे ज़्यादातर लोगों की तरह स्प्रिट का बिज़नेस नहीं कर सकते हैं, और ये बिज़नेस तो फ़ायदेमन्द है, इस अर्ध-निर्धनता से उन्हें उबारने में सक्षम.
कुछ ही दिनों बाद आर्तेम ने आश्चर्य का धक्का दिया. नाश्ते के समय, काफ़ी मशक्कत करते हुए, कभी फोर्क उठाता, कभी वापस रख देता, अपने उदास-परेशान अवतार से भूख ख़त्म करते हुए, आख़िर में बोला:
 “मैं, शायद, शादी करने वाला हूँ.”
 “आँ?...”
 “वो, ऐसा हो गया...शादी करना पड़ेगी.”
 “क्या?!” मगर, अपने कानों पर यक़ीन न करते हुए, ख़ौफ़ से, वलेंतीना विक्तोरोव्ना जैसे इसके लिए तैयार थी. न सिर्फ तैयार थी, बल्कि वह ख़ुश भी हुई, और दिमाग़ में एक स्कीम तैर गई: लड़की से मिला, शहर की लड़की से, - यहाँ दादी के पास आई है, - शादी करेंगे, उसके साथ क्वार्टर में जाएगा,   अकल ठिकाने आ जाएगी, कुछ काम धाम ढूँढेगा, हो सकता है कि इन्स्टीट्यूट में भी दाख़ला ले ले, और सब ठीक हो जाएगा.
“...नोटिस दे दिया है...”
 “अच्छा, और किससे शादी कर रहा है?” निकोलाय ख़ुश हो गया, मगर अच्छी तरह ख़ुश नहीं हुआ.”
 “वो... वो, यहीं, लड़की से पहचान हुई. सर्दियों में...”
 “ओह, तो उसके साथ तू ग़ायब रहता था?”
 “हाँ.”
 “हुम्, दिलचस्प बात है! शादी कर रहा हूँ...”
 “मगर वो है कौन?” शांत रहने की कोशिश करते हुए वलेंतीना ने पूछा. “क्या यहीं की है?’
 “हाँ...”
 “बोल भी, अब बता तो सही. कौन है वो? ये अचानक कैसे?”
 “ओह, उसका नाम भी – वलेंतीना है,” आर्तेम ने जल्दी से माँ की ओर देखा. “माँ-बाप के साथ रहती है...वहाँ, तालाब के पीछे...सत्ताईस साल की है.”
 “मतलब, तुझसे बड़ी है?”
 “हाँ, थोड़ी सी...”
 “और, माँ-बाप कौन हैं? फ़ैमिली कैसी है? बता!” निकोलाय अपना आपा खोने लगा, वलेंतीना विक्तोरोव्ना मेज़ के नीचे पैर से उसे धक्का दे रही थी. “ठीक है, धक्का मत मार!”
 “माँ के बारे में - नहीं जानता,” आर्तेम पुटपुटाते हुए आगे बोला, “ और बाप – क्लब में अकार्डियन बजाता था...पहले...गिओर्गी...उसके बाप का नाम मालूम नहीं...भूल गया...उपनाम है त्यापोव.”
 “ये तू गोश्का-अकार्डियनिस्ट की बेटी के बारे में तो नहीं कह रहा है?”  तात्याना आण्टी जैसे जाग गई.
 “हाँ, शायद...”
 “ओ-ओय, चुना भी तो किसको.”
 “क्या बात है?” वलेंतीना विक्तोरोव्ना उसकी ओर मुड़ी. “क्या कह रही हो, आण्टी?”
 “वो-ओ,” उसने अपने आशाहीनता वाले अंदाज़ से हाथ हिलाया, “ज़ुबान नहीं खुल रही...”
 “हाँ, तो” आर्तेम ने उसकी बात काटी, “थोड़ी बहुत अफ़वाहें ...”
 “ख़ामोश...!” निकोलाय ने मेज़ पर मुक्का मारते हुए कहा, “लब्ज़ों के ऐसे तीर नहीं छोड़ा करते – शादी कर रहा हूँ. तुम्हारा, चाहे कुछ भी चल रहा हो, मगर माँ-बाप को पता होना चाहिए. समझ गये? तूने अब तक हमको उससे क्यों नहीं मिलवाया? उसके माँ-बाप से? पाँच महीने तक, कहीं भी, कुछ भी, और अब – शादी कर रहा हूँ.”
 “मगर, हमारी पहचान हुई...”
 “मगर-मगर मत कर! मज़ेदार बात है: चले, और एकदम असलियत बता दी. भुगतते रहें अब, माँ-बाप! बड़ा होशियार निकला.”
वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने उसे शांत करने की कोशिश की:
 “ठहरो, चीख़ो मत, प्लीज़. मामले को सुलझाना तो पड़ेगा, पता लगाना पड़ेगा...”
 “अब और क्या पता लगाना बाकी है?! देर हो गई है पता लगाने के लिए. शादी कर रहा है वो, देख रही हो ना. और उसे इससे कोई मतलब नहीं कि फ़िलहाल हमारे पास एक भी पैसा नहीं है, कि हम सूटकेसों में जी रहे हैं. नहीं, ठीक ऐसे ही समय पे शादी के लिए दरख़्वास्त देनी है...”
निकोलाय मेज़ से उठ गया, भट्टी से सिगरेट ली, बाहर निकल गया. दरवाज़ा धड़ाम से बन्द कर दिया.
आर्तेम बैठा रहा, आहत नज़रों से इधर-उधर देखते हुए, सिर को कन्धों के बीच झुका लिया...


वलेंतीना विक्तोरोव्ना किन्हीं शब्दों को ढूँढ़ रही थी, मगर ये वो शब्द नहीं थे, दिमाग़ में जो कुछ भी आ रहा था, वो, ऐसा लग रहा था कि नुक्सान ही ज़्यादा पहुँचायेगा, हालात को बदतर बना देगा.

बुधवार, 21 जनवरी 2015

Eltyshevi - 06

अध्याय – 6


सर्दियाँ बीत गईं. कभी-कभी बड़ा मुश्किल लगता था, ऐसा लगता मानो बर्दाश्त न कर पाएँगे, इस मुर्दाघर जैसी कॉटेज में दम तोड़ देंगे, एक दूसरे को चबा जाएँगे – जगह की तंगी से झगड़े होने लगते, चिड़चिड़ाहट बढ़ जाती. मगर – फिर भी किसी तरह सर्दियाँ निकल ही गईं. आण्टी तात्याना ने मदद की.
वह सुबह क़रीब सात बजे उठ जाती और हलचल करने लगती. धीरे-धीरे कपड़े पहनती, बड़ी देर तक, वाश-बेसिन को सावधानी से टिनटिनाते हुए इत्मीनान से हाथ-मुँह धोती. भट्टी गर्माती, पानी उबालती (इलेक्ट्रिक केतली का उपयोग नहीं करती थी), चाय पीती, वो भी बड़ी देर तक ब्रेड के साथ, इत्मीनान से, जैसे इस समय पूरे दिन के लिए ताक़त इकट्ठा कर रही हो; और वाक़ई में, पूरे दिन वह न कुछ खाती, न पीती...फिर मुर्गियों को देखने निकल पड़ती, दीवार पर टंगे कैलेंडर का पन्ना फ़ाड़ती और चश्मा चढ़ाकर पढ़ती कि उस पन्ने के पीछे क्या लिखा है. नाश्ता बनाती.
हर सुबह का उसका ये धीमा, मगर ज़िद्दी, निरंतर अस्तित्व एल्तिशेवों को उठने पर, हाथ-मुँह धोने को, कुछ करने को मजबूर कर देता. बसंत तक, आज़ादी की ओर ले जाते हर दिन का सामना करने पर मजबूर कर देता.
नए साल के बाद, जिसे खाने-पीने की चीज़ों से भरी मेज़ के साथ मनाने की कोशिश की, आसमान में सूरज दिखाई देने लगा था, और बर्फ उतनी बेजान नहीं प्रतीत होती थी...आर्तेम ज़्यादा से ज़्यादा समय घर से बाहर बिताता, घूमता-फिरता, रात को देर से लौटता, मुख्यतः अपने होशो-हवास में, और माँ-बाप ये देखकर कि वह ठीक-ठाक है, उससे नहीं पूछते थे कि वह कहाँ था, किसके साथ था. होश में है, बगैर नीले निशानों के है, काफ़ी ख़ुश है – बस, इतना ही काफ़ी है. मतलब, उसने दोस्त बना लिए हैं, ऐसे लोगों को ढूँढ़ लिया है, जिनके साथ वक़्त बिताना बुरा नहीं है. चाहे कैसा भी हो, मगर उसे एक रास्ता तो मिल गया था.
फ़रवरी से निकोलाय को पेंशन मिलनी शुरू हो गई थी – सात सौ तीस रूबल्स. बिल्कुल ही चिल्लर थी ये पेंशन, बेशक, अपमानजनक भी थी, मगर फिर भी कुछ तो थी. खाने-पीने की चीज़ों, जैसे - दालें, नूडल्स, मीट, चाय, शक्कर, डिब्बा–बन्द सब्ज़ियों – के लिए पर्याप्त थी. आलू और अचार वगैरह का तात्याना आण्टी के पास पर्याप्त स्टॉक था – बल्कि, यक़ीन ही नहीं होता था कि उसने, जो मुश्किल से चल-फिर पाती है, एक पूरा टब भर के कैबेज काट कर रखी थी, क़रीब पचास डिब्बों में खीरों का, टमाटरों का अचार बनाया था, नीचे, तहख़ाने में आलू, ले गई थी, गाजर, मूली, बीटरूट, शलजम, लाल बिलबेरीज़ का मुरब्बा बनाया था. और, वह कहती थी कि किसीने उसकी मदद नहीं की थी, सिर्फ एक सहायता ये मिली थी कि बसंत में आँगन को ट्रैक्टर से जोता गया था.
जैसे ही मार्च के आरंभ में बर्फ पिघलनी शुरू हुई, एल्तिशेव कार के बारे में फ़ैसला करने गया. बीबी ने मजबूर किया – पूरी सर्दियाँ याद दिलाती रही, कि कुछ तो फैसला करना होगा; या तो उसकी मरम्मत करवाई जाए या फिर उसे बेच दिया जाए; कभी-कभी उसकी बातों से निकोलाय मिखाइलोविच भड़क जाता, चुभता हुआ जवाब देता, मगर वह समझता था कि बीबी, वाक़ई में, सही है.
शहर में आया, बस-स्टेशन के चौराहे पर कुछ देर तक सिगरेट के कश लेते हुए भीड़-भाड़ का अभ्यस्त होने की कोशिश करने लगा. सर्दियों में दो बार यहाँ आया था – पेन्शन के कागज़ात ठीक-ठाक किए, दिल को कड़ा करके पुराने साथियों से मिला, रसीदें इकट्ठा कीं.
इस बार भी काम अप्रिय ही था, फिर से मिन्नत करनी थी, कोई वादा करना था, किसी पर निर्भर करना था....
छोटी-मोटी ख़ामियाँ तो एल्तिशेव ख़ुद ही सुधार लेता था. पहली कार, मॉडेल 3 को दुरुस्त करना आसान था, सब कुछ आसान, समझ में आने वाला था. मगर इस ‘मस्क्विच-21’ से वह बेज़ार हो गया. बेवकूफ़ की तरह ख़रीद लिया था उसे, इस कार का फ़ैशन देखकर, सिर्फ बाहरी सुविधाओं, मॉडर्न डिज़ाइन की तरफ़ ध्यान दिया. मगर जल्दी ही वह उन लोगों की भीड़ में शामिल हो गया जो इस मॉडेल को गालियाँ देते थे. कभी एक चीज़ बिगड़ जाती, कभी दूसरी, अनुभवी मेकैनिक भी अचरज करते कि उसमें हर चीज़ असुविधाजनक, चालाकी से बनाई हुई है – मेकैनिज़्म को समझ ही नहीं पाते, इसलिए दुरुस्त नहीं कर पाते...उन तीन सालों में जब तक एल्तिशेव के पास ये ‘मस्क्विच’ थी, ऐसा लगता था कि उसका हर पुर्ज़ा टूट चुका है. सबसे आख़िर में बिगड़ा इंजिन...
किओस्क में ‘पे-फोन’ के लिए कूपन ख़रीदा और आंतरिक मामलों के विभाग के अपने परिचित मेकैनिक को फोन किया. वह कभी-कभी कारों की मरम्मत में उसकी मदद कर देता, या उचित सलाह दिया करता था.
मेकैनिक घर पर ही था, अपनी ड्यूटी और घर के कामों से फ्री हो गया था और वह देखने के लिए तैयार हो गया कि इस ‘इन्फेक्श्न’ को क्या हो गया है, वह सारी कारों को ‘इन्फेक्शन’ ही कहता था, और वह ठीक ही था – उसकी ज़िन्दगी का अधिकांश भाग उन्हें ठीक करने में गुज़रा था. ये सारी “झिगूली”, “UAZ, “गज़ेल”...
अपने पैतृक शहर की पसन्दीदा जगहों के किनारे-किनारे चलते हुए – वहाँ पर किसी मेहमान की तरह आना बहुत बुरा लग रहा था, - निकोलाय मिखाइलोविच अपने गैरेज की ओर गया.
उनके शहर में गैरेजों का एक अपना ही एरिया था – उनकी अलग सीमा थी, को-ऑपेरेटिव्स की सीमाओं पर उनके लिए प्लॉट्स थे; धीरे-धीरे चारों ओर घर बने, और वहाँ के निवासियों को, जिन्हें बगल में ही तैयार गैरेज ख़रीदना नसीब नहीं हुआ, नए सीमावर्ती भाग में ज़मीन मिली.
वो को-ऑपेरटिव, जिसमें निकोलाय मिखाइलोविच का गैरेज था, सेंटर से ज़्यादा दूर नहीं था – पुराना था.  किश्तें भी कुछ कम नहीं थीं, मगर प्रेसिडेंट संजीदगी से काम करता था: उसने बाऊण्डरी पर धातु की फेन्सिंग लगवाई, इकलौते गेट पर चौकीदार के लिए ऊँचा टॉवर बनवाया. उन दस सालों में, जब तक एल्तिशेव का गैरेज यहाँ पर था, उसने सिर्फ दो-तीन बार ही चोरी के बारे में सुना, और वह भी कार की नहीं, बल्कि छुटपुट चोरियाँ: बैटरी ले गए, छोटे-छोटे कलपुर्ज़े ले गए, जो गैरेजों में काफ़ी मात्रा में पड़े रहते हैं. मगर रास्ते में निकोलाय मिखाइलोविच को ऐसा महसूस हो रहा था, मानो वहाँ पहुँचकर वह देखेगा कि गेट टूटा हुआ है, और “मस्क्विच”... मगर बड़ी अजीब बात थी कि उसके मन में डर का नामोनिशान नहीं था, बल्कि वह ख़ुद भी चाहता था कि कार को वाक़ई में कोई चुराकर ले जाए, गैरेज में तोड़-फोड कर दे. चाहे बुरा ही सही, मगर ये – एक रास्ता था. इस बात पर मगजमारी नहीं करनी पड़ेगी कि रिपेयर्स के लिए पैसा कहाँ से लाए (वे एक हज़ार जो जेब में पड़े थे, शायद काफ़ी हो जाएंगे, मगर ये  कोई आख़िरी मरम्मत तो नहीं है, और ये एक हज़ार – आख़िरी हैं)...कार को गाँव ले जाएगा, फ़ौरन गैरेज बनाना पड़ेगा (फिर से – कैसे?), गैरेज के बगैर तो दो-एक साल में उसे ज़ंग खा जाएगी – वैसे भी बॉडी के नीचे ज़ंग लग ही चुकी है...गैरेज को छोड़ने में, बेशक, दुख हो रहा था – वो शहर से जुड़े रहने की आख़िरी कड़ी है – मगर छोड़ना पड़ेगा. दूसरा कोई चारा ही नहीं है. कम से कम पैसों के लिए ही बेचा जाए. चोरों द्वारा भगाये जाने से बेहतर है उसे बेच देना. पीछा छुड़ाना.
भारी-भरकम बैरियर के पास चौकीदारी कर रहे सुरक्षा कर्मी ने पहले तो निकोलाय मिखाइलोविच की ओर संदेह से देखा, मगर फिर पहचान लिया और मुस्कुराया. अन्दर आने का इशारा किया. उसकी इस हरकत ने निकोलाय मिखायलोविच की उस अजीब सी भावना को भगा दिया: नहीं, यहाँ सब कुछ भरोसे लायक है.
दाएँ-बाएँ सिमेंट के सटे हुए डिब्बों की क़तारें शुरू हो गईं. ये भी भरोसेमन्द, मज़बूत थे, जैसे बन्कर्स हों... निकोलाय मिखाइलोविच ने ख़ुद कभी गैरेज नहीं बनाया था, मगर उसकी तकनीक से अच्छी तरह वाक़िफ़ था (कई सालों तक उसके पास कार तो थी, मगर गैरेज नहीं था, बनाने के लिए जगह भी नहीं थी, इसलिए वह गैरेज बनाने के बारे में सोच रहा था).
पहले एक गहरा गड्ढा खोदा जाता है, जो चौड़ा न हो. ज़्यादातर लोग उसमें सिमेंट लगा देते हैं, मगर कुछ लोग लकड़ी के फट्टों से, घास-फूस-पत्तों से बन्द कर देते हैं. एक तहख़ाना जैसा बन जाता है. कोई-कोई इस तहख़ाने के साथ निरीक्षण करने वाला गढ़ा भी बना लेता है.  इसके बाद लकड़ी का फ्रेमवर्क खड़ा करके कॉन्क्रीट डाल कर दीवारें बनाई जाती हैं. कॉन्क्रीट बनाने के लिए सिमेंट खरीदनी पड़ती है, रेत, मिट्टी, गिट्टी लानी पड़ती है, ये सब अच्छी तरह मिलाकर बाल्टियों में भर-भरके फ्रेमवर्क में डाला जाता है.  थोड़े थोड़े सेंटीमीटर, ऊपर-ऊपर...असरदार लोग, बेशक, सोवियत काल में भी कॉन्क्रीट-मिक्सर ले आते थे, निर्माण-कार्य के लिए लोगों को किराये पर रखते थे, मगर आम जनता में मर्द ख़ुद ही ये काम कर लेते थे, अकेले, कई-कई महीनों तक.
सबसे महत्त्वपूर्ण होती थी – छत. कुछ लोग लकड़ी के प्लैन्क्स खड़े करते, कुछ – स्टील की बीम्स,   उसे डामर-कागज़ से ढाँक कर उस पर मिट्टी या फिर कॉन्क्रीट डाल देते. जिसे जितना संभव होता – टार गरम करता; ऐसे लोग भी थे जो स्लेट के कबेलू डालते. आम तौर से हर कोई छत को ज़्यादा से ज़्यादा    वायुरोधी बनाने की कोशिश करता. टपकती हुई छत मालिक के लिए सबसे बड़ी समस्या बन जाती. कभी कभी पानी दरारों से टपकता, सबसे ख़तरनाक बात तब होती जब नमी पहले छत को भिगोती है, फिर दीवारों को, शेल्फों में पड़े हुए सामान पर, स्पेयर पार्ट्स पर, कार को, ज़ंग लगा देती है, नीचे तहख़ाने में उतर जाती है...
निर्माण पूरा होने पर फर्श पर कॉन्क्रीट बिछाई गई, दरवाज़े लगाए गए, तहख़ाने से हवा का पाईप बाहर निकाला गया, भट्टी लगाई गई, बिजली का तार खींचा गया. इलेक्ट्रिशियन को बुलाया गया, जिसने गैरेज को इलेक्ट्रिक पोल से जोड़ दिया.
हाँ, एल्तिशेव ने ये गैरेज नहीं बनाया था, इसके साथ किसी तरह की घटनाएँ, कोई ख़ास समस्याएँ नहीं जुड़ी थीं, सिवाय इसके कि कुछ साल पहले उसने कच्चे-लोहे के दरवाज़े को फुल-मेटल वाले दरवाज़े से बदल दिया था (हालाँकि सर्दियों में वे गर्म नहीं रहते, मगर खुलते आसानी से हैं, टिकाऊ हैं), गैरेज की देखभाल पर ज़्यादा मेहनत भी नहीं की थी, मगर अब, जम चुकी “मस्क्विच” के चारों ओर गैरेज में घूमते हुए, अनावश्यक चीज़ों से, रद्दी सामान से भरी शेल्फों को देखते हुए, ठण्डी धूल की, सिमेंट की गंध महसूस करते हुए, उसे महसूस हुआ कि वह क़रीब-क़रीब अपने घर पहुँच गया है. मगर, क़रीब-क़रीब, अपने ख़ुद के घर भी नहीं, जिसे जल्दी ही हमेशा के लिए छोड़ देना होगा...तो क्या, वाक़ई?...कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है, गैरेज को बेचकर गाँव में ही बस जाना होगा. इमारती लकड़ी, ईंटें, सिमेंट ख़रीदना होगा. सर्दियों का एक और मौसम वे कॉटेज में नहीं बिता सकते.
निकोलाय मिखाइलोविच ने कार खोली, स्टीयरिंग पे बैठ गया. सिकुड़ गया. अन्दर बर्फ़ जैसी ठण्डक थी. हाँ, बर्फ में जम गई है...थोड़ी सी गर्मी लाने के लिए सिगरेट पीने लगा. मगर, बेटों के लिए क्या छोड़ जाएगा? आर्तेम, उसके साथ थोड़ा-बहुत, शायद उनकी ज़िन्दगी में वह ऐसा ही रहेगा. शायद ही कभी बड़ा होगा. और डेनिस...वापस आएगा डेनिस, मगर कहाँ? अगर, कम से कम, यहाँ गैरेज रहेगा तो उससे कहूँगा: ये रही तेरी दौलत, माफ़ करना, कि ऐसा हो गया. मगर कुछ तो...
इन डरावने, पागल कर देने वाले विचारों के कारण एल्तिशेव का मन हुआ कि ज़ोर से चिल्लाए और पूरी ताक़त स्टीयरिंग पर निकाल दे. उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि वह जाल में फँसे हुए किसी बड़े, शक्तिशाली जानवर के समान है, जो जाल से निकल नहीं सकता. और, चाहे चिल्लाओ, या न चिल्लाओ, जो जी में आए, करो – कुछ फ़ायदा नहीं होने वाला.
 “ओय, वहाँ कौन है?” गेट से आवाज़ आई.

निकोलाय मिखाइलोविच काँप गया. बेशक, इस अप्रत्याशित पुकार से. उसने ऐश-ट्रे में सिगरेट बुझाई और कार से बाहर निकला.

 “नमस्ते!” निकट आता हुआ मेकैनिक बोला; उसने पुलिस का गहरा नीला ‘पी-कोट’ पहना था, सिर पे स्पोर्ट्स-टोपी थी. कंधे पर पुराना बैग लटक रहा था. एल्तिशेव को मालूम था कि बैग में चाभियाँ, टेस्टर्स, और व्यवसाय से संबंधित अन्य अनेक उपकरण थे.   

 “नमस्ते, नमस्ते, सेर्योझ.”

 “तो, अब फिर से क्या हो गया तेरी कार को?”

 “ये, बस...”

निकोलाय मिखाइलोविच ने जल्दी-जल्दी गैरेज की लाईट जलाई, बोनेट खोला; ईमानदारी से बताया कि पहले खट्-खट् हुई, और फिर इंजिन जाम हो गया, पहले दिखा चुका है, मगर स्पेशलिस्ट को नहीं दिखाया, मगर वह, सेर्गेइ, वो तो मास्टर है, जादुई हाथ हैं उसके...साथ ही इस बात की भी याद आ गई, कि जब एल्तिशेव सर्विस में था, तो यही सेर्गइ उसका कृपापात्र बनने की कोशिश करता था. हो सकता है कि विशेष रूप से उसे ख़ुश करने की कोशिश न करता हो, मगर इस तरह के सवाल : “अब फिर से क्या हो गया...?” नहीं करता था. कोशिश तो करता...

रविवार, 18 जनवरी 2015

Eltyshevy - 05

अध्याय 5

नवम्बर के पहले सप्ताह में वाक़ई कड़ाके की ठण्ड पड़ने लगी. तापमान -200  तक गिर गया. बर्फ से असुरक्षित ज़मीन पर बीजों और अंकुरों को पाला मार गया. दिन अंधेरे, बेहद उदास थे, लोग उम्मीद भरी निगाहों से आसमान की ओर ताकते, इस उम्मीद में कि अब बर्फ के फ़ाहे गिरेंगे. मगर आसमान में सिर्फ भूरी धुंध थी, जिसके नीचे से हौले-हौले लाल, आँखों को चकाचौंध न करने वाला सूरज का गोला बाहर आता.
नौ तारीख़ को मरियल, मगर बर्फीली हवा चलने लगी, ख़ूब गर्माए गए घरों पर भी इसकी मार पड़ी; एक उम्मीद के साथ, मुर्दा हवा के इस एकसार झोंके को बर्दाश्त करने की कोशिश में हर ज़िन्दा चीज़ छुप गई, ठिठुर गई. और दो दिन की यातना के बाद वातावरण में कुछ गर्मी आई, और इसके बाद घनी, भारी बर्फ गिरने लगी.
पूरा दिन और पूरी रात बर्फ गिरती रही; फिर उसने कुछ देर रुक कर साँस ली, और झोपड़ियों को बर्फ के ढेर में बदलते हुए, पेड़ों की कमज़ोर टहनियों को तोड़ते हुए, गली हुई बागड़ को गिराते हुए, कच्ची छतों की शहतीरों को टेढ़ा करते हुए फिर से शुरू हो गई.
लोग गालियाँ देते हुए, दलदल जैसे बर्फ के ढेरों से संघर्ष करते हुए दुकानों में, दफ़्तर में जाते और वहाँ इस अभूतपूर्व बर्फबारी के परिणामों पर चर्चा करते. डर रहे थे, कि बिजली के तार टूट जाएँगे, शहर की ओर जाने वाला रास्ता बन्द हो जाएगा. “रोशनी के बिना, भूख से मर जाएँगे!...” मगर फिर भी चारों तरफ़ प्रसन्नता का उल्लास का वातावरण था. आख़िरकार सर्दियाँ आ ही गई थीं.
बर्फबारी के कारण वलेंतीना विक्तोरोव्ना का नौकरी ढूँढ़ने का काम रुक गया. ऐसा लग रहा था कि ज़िन्दगी का नया दौर शुरू करने की राह में वही एक रोड़ा है, और उसे अब रुक जाना चाहिए; स्कूल, क्लब, दफ़्तर जाने वाली पगडंडियों का दिखाई देना बहुत ज़रूरी है, तब वलेंतीना विक्तोरोव्ना आराम से पहुँचेगी, बात करेगी, अपनी सर्विस-बुक देगी और सब कुछ फिर से स्थिर हो जाएगा, भरोसे लायक हो जाएगा.       
गर्मियों के अंत में और शरद ऋतु में, जब यहाँ शिफ्ट होने की तैयारी कर रही थी तब उसने यहाँ काम करने की संभावना पर विशेष ध्यान नहीं दिया था. पूछना शुरू करेगी, जानकारी हासिल करेगी, प्रार्थना-पत्र देगी, हर जगह से इनकार मिलेगा – और शिफ्ट होना मुश्किल हो जाएगा. कहाँ शिफ्ट होना चाहिए? मगर फिर भी ...फिर भी उम्मीद बनी रही.
आरंभ में तो कुछ ढूँढ़ने का सवाल ही नहीं था – यही सोचते-सोचते दिमाग़ ख़राब होने की नौबत आ गई थी कि चीज़ों को ठण्ड से कैसे बचाया जाए, उन्हें कहाँ-कहाँ और कैसे रखा जाए, ताकि कॉटेज, जो वैसे भी छोटी थी, किसी ठसाठस भरे गोदाम में न बदल जाए.
फिर वह शहर गई, अपना बचा हुआ पैसा लिया, सहकर्मियों से बिदा ली. वे इस बात से ख़ुश लग रहे थे कि वलेंतीना विक्तोरोव्ना स्वेच्छा से रिटायर हो रही है. कम से कम, उन्होंने उससे रुक जाने के लिए नहीं कहा...शहर से लौटने के बाद भी स्थानीय दफ़्तरों में जाने के विचार को टालती रही, अपने-आप को ये यक़ीन दिलाते हुए कि उसके पास दूसरे ज़्यादा ज़रूरी काम हैं, और जिन्हें टाला नहीं जा सकता – असल में उतने काम थे नहीं. इसके बाद, बर्फ गिरने लगी.
चौदह की सुबह को उसने आख़िरकार फ़ैसला कर ही लिया. अपना बेहतरीन सूट पहना – हल्के गुलाबी-जामुनी रंग की प्राकृतिक ऊन की स्कर्ट और ब्लाउज़, छुट्टियों वाला ओवरकोट और ऊदबिलाव की टोपी. सावधानी से, ताकि छिछोरापन न दिखे, आँखों का मेक-अप किया, होठों पर लिपस्टिक लगाई...पति नीची स्टूल पर बैठा सिगरेट पी रहा था और भट्टी में धुँआ छोड़ रहा था, जहाँ लकड़ियाँ चटक रही थीं. तात्याना आण्टी मेज़ और अलमारी के बीच अपने कोने में बैठी-बैठी झूल रही थी. बेटा वहीं, किचन में आण्टी के पलंग पर अधलेटा किसी किताब के पन्ने पलट रहा था.
 “अच्छा, मैं निकल रही हूँ,” वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने कहा.
पति ने अपनी भारी, लाल-लाल आँखें (कल डिनर के साथ बहुत पी गया था) उठाकर उसकी ओर देखा और सिर हिला दिया:
“हुँ, चल...और मैं बर्फ हटाऊँगा...हटाना पड़ेगा.”
आण्टी और बेटे ने कुछ भी नहीं कहा. “क्या, मुझे ही सबसे ज़्यादा ज़रूरत है?!” – उत्तेजना सिर उठाने लगी, और वलेंतीना विक्तोरोव्ना जल्दी से दरवाज़े से निकल गई, जिससे कमरे में वापस न आए, औरों की तरह बैठी न रहे...वापस आकर कुछ खाने का मन कर रहा था. उसे महसूस हो रहा था कि इस सैर से कुछ लाभ नहीं होने वाला है, और अब ताक़त भी नहीं बची, सारी ताक़त तो तनाव में और दुख उठाने में खर्च हो गई, जब निकोलाय को अदालत में घसीटा जाता था; और फिर इस शिफ्टिंग में... डेनिस के बारे में याद न करने की कोशिश करती, वर्ना तो बिल्कुल ही...उसने सितम्बर में उसे लिखा था कि उनके साथ क्या-क्या हुआ था, ख़तों के लिए नया पता दिया था. उससे मुलाक़ात को अभी दो महीने बाकी थे...
सबसे पहले उस दफ़्तर में गई, जहाँ गाँव का प्रमुख व्यक्ति था – मैनेजर.
लम्बे, खलिहान जैसे घर में एक कॉरीडोर था, जिसके दोनों ओर कमरे थे. अकाऊंट्स-ऑफिस, कृषि-विशेषज्ञ, पोस्ट-ऑफ़िस, डिस्ट्रिक्ट-पुलिस ऑफ़िसर, “पेन्शन-निधि”, “ज़ाखोल्मोव्स्काया ग्राम-प्रशासन की शाखा”.... मैनेजर का कमरा कॉरीडोर की ठीक गहराई में था. जैसे वह छुप कर बैठा हो. मगर जब वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने दरवाज़ा खटखटाया तो काफ़ी जोशीली आवाज़ आई:
 “यस?”
उसने भीतर झाँका, मुस्कुराते हुए पूछा:
 “क्या मैं अन्दर आ सकती हूँ?” भीतर गई.
लिखने की मेज़ के पीछे, जिसकी वार्निश जगह जगह से उख़ड़ गई थी, क़रीब पैंतालीस साल का एक आदमी बैठा था. एकदम सलीकेदार. सूट भी पहने था. उसके सामने - अख़बार था.
 “नमस्ते,” वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने कुर्सी पर नज़र डाली मगर बैठने का फ़ैसला नहीं कर पाई. “मैं आपके  पास...मेरा नाम एल्तिशेवा वलेंतीना...”
 “अच्छा, अच्छा,” मैनेजर ने बीच ही में उसकी बात काटते हुए कहा. “हाल ही में शिफ्ट हुई हैं.”
 “मैंने रजिस्ट्रेशन करवा लिया है. सब कुछ ठीक-ठाक है...मैं, वो, ये जानना चाहती थी...”
 “बैठिए.”
 “थैंक्यू.” वलेंतीना विक्तोरोव्ना बैठ गई. मैं काम के बारे में जानना चाहती थी.”
 “अम्-म्...म्-हाँ...” मैनेजर का जोश एकदम हवा हो गया, यहाँ तक कि पलकें भी भारी होकर आँखों को दबाने लगीं. “किस लिहाज़ से?” वह अभी भी अप्रिय बातचीत से बचने की कोशिश कर रहा था.
“क्या आप मेरे लायक कोई काम दे सकते हैं? मैंने लाईब्रेरी साईन्स की ट्रेनिंग ली है, क़रीब तीस साल तक लाईब्रेरियन के रूप में काम किया है, पाँच साल – डाईरेक्टर भी रही हूँ.”
“अम्-म्...हमारे यहाँ, बेशक लाईब्रेरी तो है. आप वहाँ नहीं गईं?...मगर वहाँ फ़ाईना काम कर रही है. संभाल लेती है. बच्चों के लिए एक ‘सर्कल’ भी चलाती है.”
 “मगर क्या वह क्वालिफ़ाईड है?”
 “मालूम नहीं. मैंने उसे नहीं रखा था – ये काम कल्चरल डिपार्टमेंट करता है. स्कूल से संबंधित काम – लोक शिक्षा विभाग देखता है.”
 “क्या आपके क्षेत्र में कुछ है...” वलेंतीना विक्तोरोव्ना की ज़ुबान लड़खड़ाई, उसने कुछ शरीफ़ाना अन्दाज़ में अपनी बात रखने का फ़ैसला किया: “क्या कोई खाली जगह है?” मगर वह पीठ में हल्की-सी ठण्डक महसूस करने लगी थी; उसे यक़ीन हो चला था कि उसे काम नहीं मिलेगा, मगर वह नहीं चाहती थी कि ऐसा हो.
मैनेजर ने कंधे उचका दिए. वह मानो जम गया. उसने ऐसा दिखाया मानो कुछ सोच रहा हो. वलेंतीना विक्तोरोव्ना इंतज़ार कर रही थी. मैनेजर ने गहरी साँस ली, पैकेट से सिगरेट निकाली, माचिस सुलगाई. कुछ देर कश लेता रहा, फिर धुआँ भीतर खींचा और एक ओर को देखते हुए फिर से जम गया.
“तो फिर, क्या?” वलेंतीना विक्तोरोव्ना से रहा नहीं गया. “है? कहीं च...चपरासी ...या सफ़ाई कर्मचारी. हाँ?”
 “नहीं, मेरे पास कोई जगह नहीं है. यहाँ कुछ भी नहीं बचा है...”
 “और, मर्दों के लिए?” अपनी बदहवासी पर काबू पाने के लिए वलेंटीना विक्तोरोव्ना ने उसे बीच में रोकते हुए पूछा. “मेरा बेटा है – पच्चीस साल का...और पति की उम्र है – पचास. मगर वह...उसने तीस साल पुलिस में काम किया है...कैप्टेन था.”
“कुछ भी नहीं है,” मैनेजर मुड़ा, उसने वलेंतीना विक्तोरोव्ना पर नज़र गड़ा दी. “मेरे यहाँ स्थानीय लोग ही बेकार बैठे हैं. किसान भी, और दूसरे भी. चरवाहे, मैकेनिक, दूध दुहने वाले, ट्रैक्टर ड्राईवर्स, रसोईये...पिछले साल तक तो फ़र्म थी, मगर अब – कुछ भी नहीं है. कहीं भी, कुछ भी नहीं है.”
 “फिर...फिर यहाँ जियें कैसे?” धीरे धीरे, रुक-रुककर इन छोटे छोटे शब्दों को तौलते हुए वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने पूछा.
 “शैतान ले ...कोई पेन्शन पे जीता है, किसी को अपाहिज होकर...कर्ता पुरुष के निधन पर बच्चों के लिए सुविधाएँ...किसी को रिश्तेदार मदद कर देते हैं, कोई चला जाता है, शहर में, या जिले में नौकरी कर लेता है...ओ-ओह-ह...” मैनेजर ने सावधानी से, जिससे वह फट नहीं जाए, आधी पी हुई सिगरेट बुझा दी. “मालूम नहीं. यहाँ नौकरी करते हुए, पाँच साल से बैठा-बैठा मैनेजरी कर रहा हूँ. मैं ख़ुद एनिसैस्क से हूँ...क़िस्मत अच्छी थी, जो यहाँ भेज दिया. मगर करना क्या है – शैतान ही जानता है. अगर यहाँ सामूहिक-फार्म होता, तो हो सकता है, कुछ कर सकते थे, वर्ना तो...जैसे, तिग्रित्स्कोए में लोग रहते हैं किसी तरह इंतज़ाम कर लेते हैं, मगर वो अपना-अपना करते हैं . मगर हम – एक ही पेड़ की शाख़ाएँ हैं. हेड-ऑफ़िस ज़ाखोल्मोवो में है, पूरी टेक्नोलॉजी वहीं पर है...”
 “इस पूरी सिस्टम के बारे में मैं अच्छी तरह जानती हूँ,” वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने उसकी बात काटते हुए कहा, “मैं ख़ुद भी यहीं की हूँ. याद है कि कैसे सामुहिक फार्मों को सोवियत फार्म में मिला दिया गया था,
लोग कैसे नाख़ुश थे. मगर, ये सच है कि मैं शहर में काफ़ी अर्से तक रही...और अब ढलती उम्र में...पता चलता है, कि मेरी ज़रूरत नहीं है...” वलेंतीना का रोने को मन कर रहा था, मगर मैनेजर की शिकायतों ने आँसुओं को रोक दिया.
 “आख़िरी तीस गायों को उस साल ज़ाखोल्मोवो भगा दिया. फर्म में, कहते हैं कि कभी सौ से ज़्यादा लोग काम किया करते थे, मगर अब सिर्फ दो चौकीदार बचे हैं – गोशाला की चौकीदारी करते हैं, जिससे कोई खपरैल खींच कर न ले जाए...सिलाई-कारखाना था – बोरे सिलते थे. जल गया. खेत ऐसे थे, गेहूँ तक पैदा होता था...कुछ भी नहीं बचा...बिना किसी भावना के यहाँ बैठा-बैठा सोचता रहता हूँ.”
वलेंतीना विक्तोरोव्ना उठकर दफ़्तर से बाहर आ गई.
सड़क पर नज़र दौड़ाई. कॉटेजेस सड़क के किनारे-किनारे बनी थी, खिड़कियों तक बर्फ से लदी हुई, जैसे उन्हें छोड़ दिया गया हो. मगर पाईप से धुआँ निकल रहा था, मतलब वहाँ लोग रहते हैं, वहाँ खाना बनाया जाता है, किन्हीं कपड़ों में वे ढँके हुए हैं, शायद, उनके पास, चाहे एक हफ़्ते में ही सही, सूरज की रोशनी आयेगी, मतलब, भविष्य में. मगर उसके पास? उसके परिवार के पास? कुछ थोड़ी बहुत पूंजी है, जिससे मुश्किल से महीने भर काम चल जाएगा, मगर आगे?... निकोलाय को पेन्शन के लिए भेजना होगा. इतने साल की नौकरी का हक बनता है...और उसे भी कुछ-न-कुछ मिलेगा...क़ानूनन पेन्शन के लिए दो साल बचे थे, पचास की उम्र तक. दो दुर्भाग्यपूर्ण साल. मगर उन्हें कैसे काटें?
लाईब्रेरी में जाना चाहती थी, मगर नहीं गई. फ़ायदा क्या है? वहाँ फाईना है – मैनेजर के लब्ज़ों में अच्छी कर्मचारी  है. सर्कल...स्कूल की ओर बढ़ गई.
दोमंज़िला, पत्थर की इमारत, जो पिछली से पिछली सदी में बनाई गई थी. भीतर से बहुत आरामदेह – बड़ी-बड़ी, अर्धगोलाकार खिड़कियाँ, उजली दीवारें, बच्चों के बनाए हुए चित्र टंगे थे. कोटू के पॉरिज की ख़ुशबू आ रही थी.
 “आपको कहाँ जाना है?” संदेह से आँखों को सिकोड़ते हुए नीले गाऊन वाली बुढ़िया बेंच से थोड़ा सा उठी.
 “मुझे – डाइरेक्टर के पास.”
 “किसलिए?”
वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने होंठ टेढ़े कर लिए:
 “प्राइवेट काम है. परिचय के लिए.”
 “अच्छा?...और आप कहाँ से हैं?”
 “आपको इससे क्या फ़रक पड़ता है?”
 “ये क्या बात हुई – ‘क्या फ़रक पड़ता है’? मेरी ड्यूटी ही है हर चीज़ पर नज़र रखना. अगर कुछ हो जाता है,” कहते हुए बुढ़िया हौले से चलकर कॉरीडोर को घेरते हुए खड़ी हो गई, “अगर कुछ हो जाता है, तो कौन जवाब देगा?”
“मैं...मैं डाइरेक्टर से सिर्फ मिलना चाहती हूँ! हुम्...” वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने स्वयँ पर काबू किया, मुँह से फूटने वाली चीख को रोका. “समझ रही हैं, मैं कई साल पहले इस स्कूल में पढ़ती थी, जिला केन्द्र में लाईब्रेरी का कोर्स पूरा किया, लम्बे समय तक शहर में रही, अब लौटकर वापस आई हूँ और डाइरेक्टर से मिलना चाहती हूँ. मेरा नाम वलेंतीना विक्तोरोव्ना है, शादी से पहले का उपनाम है – कन्दाऊरोवा. मेरे माँ-बाप यहाँ के जाने-माने लोगों में से थे. आण्टी, आण्टी तान्या मतासोवा, अब तक ज़िन्दा है, यहीं बगल में, दो कदम की दूरी पे.”
 “मगर बुढ़िया पर इस पारिवारिक इतिहास का कोई असर न हुआ:
“तो क्या? क्लास चल रही है, स्कूल में ऐसे घूमना मना है. डाइरेक्टर भी क्लास में है. जब घण्टी बजेगी, तब जाने दूँगी.”
 “समझ गई...”
वलेंतीना विक्तोरोव्ना को अचानक भीषण थकान महसूस हुई, इस, गाऊन वाली का, गुस्सा भी चला गया. बच्चों वाली छोटी बेंच पर बैठ गई. बुढ़िया कुछ देर खड़ी रही, फिर वह भी बैठ गई.
 “और आप, क्या यहाँ की नहीं हैं?” वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने पूछा; कन्दाऊरोवा उपनाम पर, जो क़रीब चालीस पहले आधे गाँव का होता था, हर स्थानीय व्यक्ति की कुछ न कुछ प्रतिक्रिया ज़रूर होती.
  “मैं? मैं तूवा की हूँ.”  बुढ़िया ने लम्बी. गहरी साँस ली. “सन् 93 में यहाँ आ गए. दस साल बस यूँ ही...वहाँ, मेझेगे गाँव में भी हम रहे. नाम नहीं सुना?”
 “नहीं.”
तूवा, जहाँ हर विशेषज्ञ जाना चाहता था (तनख़्वाह अच्छी थी, तरक्की जल्दी जल्दी होती थी, कई तरह की छूट मिलती थी, क्वार्टर की वेटिंग लिस्ट जल्दी जल्दी सरकती थी), दक्षिण की ओर, सायान्स्की पर्वतों की दूसरी ओर स्थित था. मगर अस्सी के दशक के अंत में, सोवियत संघ के अन्य गणराज्यों की ही तरह, तूवा में भी प्रांतीय झगड़े शुरू हो गए, और उक्राइनी, ग्रूज़िनी, रूसी – याने कि आम तौर से, वे जो यहाँ के मूल निवासी नहीं थे, वहाँ से बाहर निकलने लगे. स्तेपी के गाँवों और देहातों के कुछ लोग तो जान से मारने की, ज़िन्दा जला देने की धमकियों से घबराकर, अपना माल-असबाब छोड़-छोड़कर भागे...ज़्यादातर लोग उस शहर में बस गए जहाँ एल्तिशेव रहते थे, और एक ऐसा भी समय आया, सन् 93 में, जब वे काम की तलाश में सभी दफ़्तर छान रहे थे. वलेंतीना विक्तोरोव्ना के पास भी कुछ महिलाएँ आईं थीं, आँखों में याचना लिए. “क्या आप मुझे नहीं लेंगी? मैं जिला-लाईब्रेरी में प्रमुख थी...मैं स्कूल की लाईब्रेरी में बीस साल काम कर चुकी हूँ...”
“बड़ी अच्छी ज़िन्दगी थी,” बुढ़िया बता रही थी, “ आराम से रहते थे. बाज़ू में ही चीड़ का जंगल था, और, यहाँ जैसा सूखा नहीं, बल्कि खूब भरा-पूरा था. दूधिया-मशरूमों को हँसियों से काट-काटकर, ड्रमों में भर-भरके नमक लगाके रखते. एक तह दूधिया-मश्रूमों की, दूसरी नारंगी मश्रूमों की, फिर भूरे लहरियेदार मश्रूमों की, फिर वापस दूधिया-मश्रूमों की.... और लाल बिल्बेरीज़, और मधुमालती. ख़रगोश इत्ते सारे. मेरा  आदमी फंदा लगा देता, हमेशा छोटे ख़रगोश के पिल्ले ही फंसते. ये तूवा वाले, क़रीब–क़रीब थे ही नहीं, जो भी थे, बड़े ख़ामोश-तबियत, कामकाजी... और कॉटेज कैसी-कैसी बनाते थे! पत्तों की लुगदी से, दो सौ साल तक उन्हें कुछ नहीं हो सकता था... शेड्स, गुसलखाने – कैबिन्स. बगल में ही चीड़ के पेड़, मगर जानबूझकर पत्ते सायान से लाते थे, जिससे वे सड़ न जाएँ...मगर जैसे ही ये हड़कम्प शुरू हुआ, हमारे यहाँ भी शुरूआत हो गई. पहले तो रातों में घोड़ों पर आते थे, जो भी चीज़ मिलती उसे घसीटते हुए ले जाते थे, इसके बाद तो सीधे-सीधे लूट-मार पे उतर आए. आख़िर-आख़िर में तो लोग कपड़े पहनकर सोते थे...
बुढ़िया लगातार बोले जा रही थी, उसे इससे कोई मतलब नहीं था कि कोई उसकी बात सुन रहा है या नहीं, और इस एकसार- दयनीय आवाज़ के बोझ तले वलेंतीना विक्तोरोव्ना अपनी ज़िन्दगी की गांठें  खोल रही थी और ये याद करने की कोशिश कर रही थी कि क्या पिछली ज़िन्दगी में विश्वसनीयता के कोई ऐसे पल थे, जो असली थे, जिन पर कोई ग्रहण नहीं लगा था, जब कल की फिक्र से परेशानी नहीं होती थी...नहीं, बेशक, ऐसे दौर थे तो सही, और कई सालों के थे, मगर अब वे याद नहीं आ रहे थे. सही-सही कहें तो – विश्वसनीयता के ऐसे किसी एहसास की याद बाक़ी नहीं थी.
 “....और हमने वहाँ से चले जाने का फ़ैसला कर लिया. पूरे गाँव के साथ मिलकर फ़ैसला किया. सैंकड़ों घर थे. माल-असबाब ले जाने के लिए गाड़ियाँ कम पड़ रही थीं, अगर किसी को कुछ बेचना भी हो तो किसे बेचें? कहाँ? सभी जा रहे हैं...मेरे पास बेटा था अपने परिवार के साथ, और बेटी कब से उनकी राजधानी में, कीज़िल में रहती थी. अब शूशेन्स्कोए में है. तो पहले हम उसके यहाँ गए, वहाँ से फिर किसी तरह यहाँ आए. बेटे को यहाँ एक छोड़ा हुआ घर मिल गया, ग्राम-सोवियत से उसे ख़रीद लिया. थोड़ी सी मरम्मत कर ली...किसी तरह रहने लगे. धीरे धीरे नया घर बसाया. अब कोई बात नहीं है, मगर शुरू में तो कितनी मुसीबत उठानी पड़ी थी...यहाँ भी पहले हमें लूटा ही गया, मोटरसाईकल उठाकर ले गए. सीधे आँगन से. मिली ही नहीं. बेटा रोया...और मेरा मरद तो पड़ा है मेझेगेय में. वो सन् 88 में ही मर गया, हमारी तकलीफ़ों को उसने नहीं देखा. ओ-ओह...उसकी क़ब्र का क्या हाल है, पता नहीं. क़रीब-क़रीब हर रात गाँव मेरे सपने में आता है. चीड़ का जंगल, और पहाड़, और सभी कुछ...यहाँ की हर चीज़ बिल्कुल अलग है...
बुढ़िया की बातों में से वलेंतीना विक्तोरोव्ना के दिमाग़ में दो शब्द रह गए – “कार” और “चुरा ली”... निकोलाय से कार के बारे में बात करनी होगी – क्या उसे रखना है, या नहीं रखना है? और गैरेज का क्या करना है? क्या उसे भी बेच दिया जाए, और कार को भी, या फिर क्या करना है? कुछ न कुछ तो निश्चित करना ही होगा. और चोरियाँ...आण्टी भी कई बार कह चुकी हैं : ख़तरनाक चोरियाँ करते हैं. ख़ुदा की मेहेरबानी से, अब तक उन्हें नहीं छुआ है, मगर, यदि कार भगा ले गए तो – बिल्कुल ले जा सकते हैं...
बुढ़िया ने दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा और गहरी साँस लेते हुए उठी. घंटी दबाई; घुटी-घुटी, जैसे अल्युमिनियम की होती है, घण्टी टिरटिराई.
 “दूसरी मंज़िल पे जाईये,” उसने वलेंतीना विक्तोरोव्ना से कहा, “और वहाँ बाएँ हाथ पे पहला दरवाज़ा. उसका नाम है ओल्गा पेत्रोव्ना.”
 ओल्गा पेत्रोव्ना ऊँची, हट्टी-कट्टी, जवान औरत थी. रोबदार.
उसने वलेंतीना विक्तोरोव्ना का प्यारी सी मुस्कुराहट से स्वागत किया, जिससे उसके सामने के दाँतों पर लगी धातु की पट्टी दिखाई देने लगी. बिठाया, चाय के बारे में पूछा.
नर्मी से, धन्यवाद देते हुए वलेंटीना विक्तोरोव्ना ने इनकार किया, स्कूल की तारीफ़ करने लगी – कितना आरामदेह, गर्माहट भरा, ख़ूब रोशनी वाला है. बताया कि वह जन्म से यहीं से है, मगर रहती शहर में थी. और फिर, हिम्मत करके, पूछा कि क्या उनके पास कोई खाली जगह है, यह भी जोड़ा: तीस साल लाईब्रेरी में काम कर चुकी है, जिनमें से पाँच साल लाईब्रेरी-प्रमुख रही है, रूसी साहित्य अच्छी तरह जानती है...
ओल्गा पेत्रोव्ना के चेहरे पर उकताहट के भाव आ गए, मुस्कुराहट की जगह कड़वाहट ने ले ली, होठों के किनारे खिंच गए, गालों के नीचे गढ़े पड़ गए.
 “अफ़सोस है कि मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकती,” उसने कहा. “केमिस्ट हमारे पास नहीं है, मगर आप केमिस्ट नहीं है...और इन सब लिन्क्स के बारे में मैं कुछ नहीं समझती...नहीं, सभी सरकारी स्थान भरे हुए हैं. अगर आप तीन साल पहले...तब हमारे पास क़रीब-क़रीब कोई भी नहीं था, मुझ अकेली को ही इतिहास भी पढ़ाना पड़ता था, और भूगोल भी, और प्रैक्टिकल-वर्क भी. मगर अब लोग समझ गए हैं कि इससे बेहतर कोई और जगह उन्हें नहीं मिलेगी – हालाँकि तनख़्वाह दो हज़ार है, मगर, कुछ न होने से तो बेहतर है...ज़ाखोल्मोवा से एक महिला रोज़ आती है, फ़िज़िक्स-टीचर है, जबकि यहाँ से एक तरफ़ की ही दूरी तीस किलोमीटर्स है. मगर, बेचारी, भटक रही है...
फिर से घंटी बजी. डाईरेक्टर फ़ौरन उछली:
 “माफ़ कीजिए, मुझे क्लास में जाना है. सातवीं क्लास. किसी ख़ौफ़नाक सपने जैसा है – हर बार युद्ध का मैदान.”
वलेंतीना विक्तोरोव्ना, सिर हिलाते हुए दरवाज़े की ओर बढ़ी. डाईरेक्टर उसके पीछे-पीछे ही चल रही थी, अफ़सोस से बोली:
 “कंट्रोल करना एकदम असंभव है. किसी भी चीज़ का उन पर असर नहीं होता. मैं कहती हूँ, आप लोग अभी ज़िन्दगी की नींव रख रहे हो, आगे कोई तुम्हारी देखभाल नहीं करेगा...कोई असर नहीं! लड़कियाँ तो लड़कों से भी ज़्यादा बुरी हैं. आठवीं और नौवीं क्लास में थोड़ा बहुत समझने लगते हैं, मगर तब तक, अक्सर देर हो चुकती है...हमारा स्कूल तो नौंवी तक है. सात साल पहले ये परिवर्तन हुआ है. ऐसा होता है कि कोई मिडल-क्लास तक की शिक्षा प्राप्त करना चाहता है – या शहर चला जाता है अपने रिश्तेदारों के पास, या ज़ाखोल्मोवो. दो-तीन को हम पूरी शिक्षा दे सके – दूरस्थ विधि से, सही कहें तो. जिले से कमिटी आई थी. इम्तिहान ऐसे – कि सीधे मॉस्को विश्वविद्यालय में जा सकते हैं. मगर कुछ नहीं हुआ, बच्चों ने नीचा नहीं दिखाया, पास हो गए. मगर अब, सही में, यहीं हैं. एडमिशन के लिए पैसे ही नहीं हैं... और काम के बारे में देखें तो...मालूम नहीं मैं आपको क्या सलाह दूँ. हमारे यहाँ हालत बेहद ख़राब है. मगर, अगर अचानक कोई जगह निकल आती है, तो मैं, बेशक...”
घर लौटी – निढ़ाल, टूटी हुई. जैसे किसी ने लाठियाँ मार-मार के भगाया हो. दीवान पर पड़ कर सोने का, सोते रहने का मन कर रहा था.
मगर घर पे आई हुई थी एक मेहमान. बैठी थी सजी-धजी, क़रीब चालीस साल की एक महिला, हल्के भूरे वालों वाली, आकर्षक चेहरा. अपनी उस दयनीय अवस्था में भी वलेंतीना विक्तोरोव्ना को उस से सहानुभूति महसूस हुई. या वह महसूस करना चाहती थी. हो सकता है, ये सहानुभूति ख़ास उससे नहीं, बल्कि उस विश्वासनीयता से थी, जो उस से बिखरी जा रही थी.
  
मेहमान चाय के लिए सजाई गई मेज़ पर बैठी थी, उसके सामने – निकोलाय था. बेटा किचन में नहीं था, आण्टी, हमेशा की तरह अपनी कुर्सी में झूल रही थी, वह मेहमान की ओर लगातार देखे जा रही थी, समझना मुश्किल था कि वह उसे दिलचस्पी से देख रही है, या शत्रुता के भाव से.
 “ओ, ये रही वाल्या!” पति ने कुछ आश्वस्तता के भाव से ख़ुश होते हुए कहा. “उसके साथ बात करनी पड़ेगी...”
मेहमान ने वलेंतीना विक्तोरोव्ना पर फ़ौरन एक पैनी नज़र डाली, एक पल में उसे पूरा देख लिया, भाँप लिया और मुस्कुराने लगी. थोड़ा उठकर बोली:
 “नम-स्ते, वलेंतीना!” – उसने हाथ आगे बढ़ाया.
वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने अनाड़ीपन से उससे हाथ मिलाया – हाथ मिलाकर अभिवादन करने की उसे आदत नहीं थी. वह दरवाज़े पर वापस लौटी, ठकठकाकर जूतों से बर्फ़ निकाली. ओवरकोट उतारने लगी.
 “ये है हमारी पडोसन,” निकोलाय बोलने लगा. “एलेना...म...म?”
 “बिना पिता के नाम के भी बुला सकते हैं.”
 “एलेना ख़ारिना. ये अपने पति के साथ बगल वाली रोड़ पर रहती है...”
 “हमारे पाँच बच्चे हैं,” मेहमान ने उसकी बात को पकड़ते हुए कहा. “बड़ा है पन्द्रह साल का और सबसे छोटी अन्यूता - साढ़े तीन साल की.”
 “और सब कहते हैं कि प्रजोत्पादकता की दर घट रही है.” वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने चाय की केटली का स्विच ऑन किया. “आपके पाँच बच्चे हैं, यूरी के – छह. और, मैंने सुना है कि, और लोगों के भी बहुत सारे हैं...क्या आप लोग स्थानीय हैं?”
 “ओह, न-हीं, क्या कह रही हैं! ब्रात्स्क से आए हैं. आधा सामान अभी भी वहाँ है.”
 “समझ गई. सारे बाहर से आए हुए ही हैं. मैनेजर, और स्कूल की टेक्निशियन...”
मेहमान ने सहमति में सिर हिलाया:
 “बाहरी आदमी बहुत सारे हैं. मैं कल्पना कर सकती हूँ कि फ़िलहाल आपको कैसा लग रहा होगा. हम ख़ुद भी ऐसा ही...आपकी तो दादी यहाँ है.” आण्टी तान्या की ओर संक्षिप्त मुस्कुराहट फेंकते हुए आगे बोली, “हमारे कोई परिचित भी नहीं थे. किसी ने उँगली उठाई, और हम निकल पड़े. हमारी जड़ें – मेरी, और मेरे पति की – यूराल में हैं. माँ-बाप वहीं के हैं. कोम्सोमोल्स्क के टिकट पर इलेक्ट्रिक पॉवर स्टेशन का निर्माण करने चले आए. मगर, हम, अब वहाँ से निकल रहे हैं. बिल्कुल वहीं...कोई सभ्यता नहीं, कुछ भी नहीं.”
चाय की केतली उबलकर खट् से बन्द हो गई. वलेंतीना विक्तोरोव्ना मुश्किल से उठी.
 “चाय पिएँगी?”
 “मैं पी चुकी हूँ. ख़ैर, डालिए थोड़ी सी. आपके निकोलाय बढ़िया चाय बनाते हैं...”
 “और आर्तेम कहाँ है?” वलेंतीना विक्तोरोव्ना ने पति से पूछा.
 “चला गया. कहा कि घूमने जा रहा है.”
  “मैं इसलिए आई हूँ,” वलेंतीना विक्तोरोव्ना के वापस मेज़ पर बैठ जाने के बाद एलेना ने अपनी बात शुरू की. “बेशक, आपसे पहचान करने, और मदद की पेशकश करने. हम समझते हैं कि शून्य से आरंभ करना क्या होता है... मैं आपके पति से बात कर रही थी...आप कुछ कंस्ट्रक्शन तो करेंगी ही. आख़िर आप सब लोग यहाँ कैसे...उसने संकरे, कम ऊँचे किचन पर नज़र डाली.  “कुछ पैसा, बस पहली बार देना पड़ेगा. तो ऐसी बात है. ज़ाखोल्मोवो में जंगल की लकड़ी-कटाई का डाईरेक्टर हमारा दोस्त है. लकड़ी के बोर्ड्स, बीम्स, स्लैब्स... सब कुछ क्रय-मूल्य पर दे देगा. सिमेंट वालों से भी संबंध है. सिमेंट की कीमत तो पागल की तरह बढ़ रही है! मगर हमारे पास दूसरे रास्ते हैं...पेट्रोल वाली आरी, निकोलाय बता रहा था, आपके पास नहीं है. गाँव में उसके बगैर क्या करेंगे? हम अपनी वाली दे सकते हैं. हमारे पास दो हैं. दूसरी कंटेनर से फरवरी में आ जाएगी. दोस्ती की ख़ातिर दे देंगे. हाँ? और शायद ....सुअर तो पालेंगे ही, गाय भी, शायद, पालेंगे. यहाँ अपने मवेशियों के बिना काम नहीं चलेगा. चारे के इंतज़ाम में भी मदद कर देंगे. वैसे तो ये काम मुश्किल है, मगर हमने सम्पर्क बना लिए हैं. पता नहीं, अगर सब कुछ मार्केट-रेट पर ख़रीदना पड़ता, तो हम यहाँ कैसे ज़िन्दा रहते...

वलेंतीना विक्तोरोव्ना में मेहमान की बकबक सुनने की ताक़त नहीं बची थी – उसके दिमाग़ पर आज दिन भर ऐसे एकालापों की लगातार बरसात होती रही थी. दिन बहुत भारी रहा था, - मगर इस बात से उसे ख़ुशी हुई कि एक अनजान व्यक्ति अचानक आकर अपनी मदद की पेशकश करे, चाहे किसी स्वार्थवश ही सही. दिल में गर्माहट महसूस हुई, सामने रोशनी की किरण नज़र आई. कोई बात नहीं, ये आरंभिक दिन भी गुज़र ही जाएँगे, सब कुछ ठीक हो जाएगा, कुछ कर सकते हैं...उसने हाथ आगे बढ़ाकर पति की मुट्ठी पर रखा. उत्साह पूर्वक दबाया.